jagannath mandir puri, orissa

जगन्नाथ  मंदिर , पुरी ( ओड़िसा )  के  बारे में सम्पूर्ण जानकारी 


यह मंदिर भारत के उड़ीसा राज्य के पुरी शहर में स्तिथ है | पुरी का यह जगन्नाथ  मंदिर एक हिन्दू मंदिर है ,जो भगवान श्री कृष्ण को समर्पित है | 

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हिन्दू धर्म के अनुसार चार पवित्र धाम है - बद्रीनाथ मंदिर (बद्रीनाथ) उत्तर में, जगन्नाथ मंदिर ( पुरी ) पूर्व में,  द्वारकाधीश मंदिर (द्वारका) पश्चिम में , रामेश्वरम मंदिर (रामेश्वरम ) दक्षिण में | मान्यता है कि भगवान विष्णु जब चारों धाम पर बसे तो सबसे पहले बदरीनाथ गए और वहां स्नान किया, इसके बाद वो गुजरात के द्वारिका गए और वहां कपड़े बदले | द्वारिका के बाद ओडिशा के पुरी में उन्होंने भोजन किया और अंत में तमिलनाडु के रामेश्वरम में विश्राम किया |  पुरी में भगवान श्री जगन्नाथ का मंदिर है पुरी के इस मंदिर में भगवान जगन्नाथ, उनके भाई बालभद्र और बहन सुभद्रा की काठ (लकड़ी) की मूर्तियां हैं | लकड़ी की मूर्तियों वाला ये देश का अनोखा मंदिर है | जगन्नाथ मंदिर की ऐसी तमाम विशेषताएं हैं, साथ ही मंदिर से जुड़ी ऐसी कई कहानियां हैं जो सदियों से रहस्य बनी हुई है | मंदिर से जुड़ी एक मान्यता है कि जब भगवान कृष्ण ने अपनी देह का त्याग किया और उनका अंतिम संस्कार किया गया तो शरीर के एक हिस्से को छोड़कर उनकी पूरी देह पंचतत्व में विलीन हो गई | मान्यता है कि भगवान कृष्ण का हृदय एक जिंदा इंसान की तरह ही धड़कता रहा |  कहते हैं कि वो दिल आज भी सुरक्षित है और और भगवान जगन्नाथ की लकड़ी की मूर्ति के अंदर है | 

मंदिर की संरचना :



मुख्य मंदिर वक्ररेखीय आकार का है। इसके शिखर पर भगवान विष्णु, जिसके शिखर पर विष्णु का श्री सुदर्शन चक्र (आठ आरों का चक्र) मंडित है। इसे नीलचक्र भी कहा जाता है। इसे अष्टधातु से बनाया गया है। इसे बेहद पावन माना जाता है। मंदिर का मुख्य ढांचा 214 फीट ऊंचे पाषाण चबूतरे पर स्थित है। इसके गर्भगृह में मुख्य देवताओं की मूर्तियां स्थापित हैं। मुख्य भवन 20 फीट ऊंची दीवार से घिरा हुआ है। वहीं, दूसरी दीवार मुख्य मंदिर को घेरे हुए है।मंदिर के पास खड़े रहकर इसका गुम्बद  देख पाना असंभव है | आमतौर पर दिन में किसी वक्त किसी भी इमारत या चीज या चीज या इंसान की परछाई जमीन दिखाई देती है लेकिन जगन्नाथ मंदिर की परछाई कभी किसी ने नहीं देखी ,यह बहुत ही आश्चर्चय घटना है | 

मंदिर का उद्गम :

गंग वंश के अन्वेषित ताम्र पत्रों से यह ज्ञात हुआ कि,वर्तमान  मंदिर के निर्माण  कार्य को  कलिंग राजा अनंतवर्मनचोडगंग  देव ने   आरम्भ  कराया था | फिर सन्न  1174 ईसवी  में जाकर उड़ीसा  शासक अनंग  भीम देव ने इस मंदिर को वर्तमान रूप दिया था | 


मंदिर से जुड़ी  कथाएं :


ऐसी मान्यता है कि भगवान जगन्नाथ  की इंद्रनील या नीलमणि से निर्मित मूल मूर्ति एक अगरु वृक्ष के नीचे मिली थी | यह इतनी चकाचौंध करने वाली थी की धर्म ने इसे पृथ्वी के निचे छुपाना चाहा | यही मूर्ति मालवा नरेश इन्द्रद्युम्न को स्वप्न में दिखाई दी थी | तब उसने कड़ी तपस्या की और तब भगवान् विष्णु ने बताया की वह पुरी के समुद्र तट पर जाये और उसे एक दारू (लकड़ी ) का लट्ठा मिलेगा | 
उसी लकड़ी से वह मूर्ति का निर्माण कराये | राजा ने ऐसा ही किया और उसे लकड़ी का लट्ठा मिल भी गया | उसके बाद राजा को विष्णु और  विश्वकर्मा  बढ़ई कारीगर और मूर्तिकार के रूप में उसके सामने उपस्तिथ हुए | किन्तु उन्होंने यह शर्त रखी कि वे एक माह में मूर्ति तैयार कर देंगे | परन्तु तब तक  कमरे में बंद रहेंगे और राजा या कोई भी उस कमरे के अंदर नहीं आये | 

माह के अंतिम दिन  जब कई दिनों तक कोई भी आवाज़  नहीं आया तो राजा ने उत्सुकता वश  कमरे में झाँका तो वह वृद्ध कारीगर ने कहा की मूर्तियां तो अभी पुरे नहीं बने हैं | राजा के अफ़सोस करने पर मूर्तिकार ने बताया की यह सब देववश हुआ है और यह मूर्तियां ऐसे ही स्थापित होकर पूजी जाएंगी | तब वही तीनों जगन्नाथ ,बलभद्र और सुभद्रा  मूर्तियां मंदिर में स्थापित की गयीं | 



समुद्र की ध्वनि :



जगन्नाथ पुरी मंदिर समंदर किनारे पर है | मंदिर में एक सिंहद्वार है. कहा जाता है कि  ही सिंहद्वार के अंदर कदम जाता है तो लहरों की आवाज गुम हो जाती है |  इसी तरह सिंहद्वार से निकलते वक्त वापसी में जैसे ही पहला कदम बाहर निकलता है, समंदर की लहरों की आवाज फिर आने लगती है|  ये भी कहा जाता है कि सिंहद्वार में कदम रखने से पहले आसपास जलाई जाने वाली चिताओं की गंध भी आती है, लेकिन जैसे ही कदम सिंहद्वार के अंदर जाता है  ये गंध भी खत्म हो जाती है. सिंहद्वार के ये रहस्य भी अब तक रहस्य ही बने हैं| 


पक्षी नजर नहीं आते :


आमतौर पर मंदिर, मस्जिद या किसी बड़ी इमारत पर पक्षियों को बैठे हुए देखा जाता है  | लेकिन जगन्नाथ मंदिरपरकभी किसी पक्षी को उड़ते हुए नहीं देखा गया | कोई पक्षी मंदिर परिसर में बैठे हुए दिखाई नहीं दिया |  |  यही वजह है  कि मंदिर के ऊपर से हवाई जहाज, हेलिकॉप्टर के उड़ने पर भी मनाही है | 

 

मंदिर के झंडे का रहस्य :


 इसके अलावा मंदिर के शिखर पर जो झंडा लगा है, उसे लेकर भी उसे लेकर भी बड़ा रहस्य है |  इस झंडे को हर रोज बदलने का नियम है |  मान्यता है कि अगर किसी दिन झंडे को नहीं बदला गया तो शायद मंदिर अगले 18 सालों के लिए बंद हो जाएगा |  इसके अलावा ये झंडा हमेशा हवा की विपरीत दिशा में  है | 


आमतौर पर दिन में किसी वक्त किसी भी इमारत या चीज या चीज या इंसान की परछाई जमीन दिखाई देती है लेकिन जगन्नाथ मंदिर की परछाई कभी किसी ने नहीं देखी.

मंदिर के शिखर पर एक सुदर्शन चक्र है जिसे नील चक्र  भी  कहा जाता है जो अष्टधातु से निर्मित है  |  पुरी के किसी भी स्थान से अगर इस सुदर्शन चक्र को देखा जाए तो उसका मुंह आपकी तरफ ही नजर आता है | 




मंदिर की रसोई का रहस्य :


कहा जाता है कि जगन्नाथ मंदिर में दुनिया की सबसे बड़ी रसोई है | इस रसोई में 500 रसोइये और 300 उनके सहयोगी काम करते हैं |  इस रसोई से जुड़ा एक रहस्य ये है कि यहां चाहे लाखों भक्त आ जाएं कभी प्रसाद कम नहीं पड़ा |  लेकिन जैसे ही मंदिर का गेट बंद होने का वक्त आता है प्रसाद अपने आप खत्म  हो जाता है | यानी यहां प्रसाद कभी व्यर्थ नहीं होता है | 

इसके अलावा मंदिर में जो प्रसाद बनता है वो लकड़ी के चूल्हे पर बनाया जाता है | ये प्रसाद  सात बर्तनों में बनाया जाता है |  सातों बर्तन को एक-के ऊपर एक करके एक-साथ रखा जाता है |  यानी सातों बर्तन चूल्हे पर एक सीढ़ी की तरह रखे होते हैं | सबसे हैरानी की बात ये है कि जो बर्तन सबसे ऊपर यानी सातवें नंबर का बर्तन होता है उसमें सबसे पहले प्रसाद बनकर तैयार होता है. इसके बाद छठे, पांचवे, चौथे.तीसरे, दूसरे और पहले यानी सबसे नीचे के बर्तन का प्रसाद तैयार होता है | 


जगन्नाथपुरी की वार्षिक रथ यात्रा:


कहा जाता है कि भगवान जगन्नाथ की बहन सुभद्रा ने एक दिन ने उनसे द्वारका के दर्शन करने की इच्छा जताई। तभी भगवान जगन्नाथ ने उनकी प्रार्थना स्वीकार की और सुभद्रा की इच्‍छा पूर्ति के लिए उन्‍हें रथ में बिठाया और पूरे नगर का भ्रमण करवाया। बस इसके बाद से ही जगन्नाथपुरी की रथयात्रा की शुरुआत हुई थी। इस मंदिर का वार्षिक रथ यात्रा उत्सव पूरे विश्व में प्रसिद्ध है। मध्य काल से ही यह उत्सव बेहद हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता रहा है। इसमें मंदिर के तीनों मुख्य देवता, भगवान जगन्नाथ, उनके बड़े भाई बलभद्र और भगिनी सुभद्रा तीनों की ही तीन अलग-अलग भव्य और सुसज्जित रथ यात्रा निकाली जाती है। जगन्नाथपुरी वैष्णव परंपराओं और संत रामानंद से जुड़ा है। इसका विशेष महत्व गौड़ीय वैष्णव संप्रदाय के लिए है।

रथ यात्रा का महत्व :


माना जाता है कि इस दिन स्वयं भगवान अपने पूरे नगर में भ्रमण करते हैं। वह लोगों के बीच स्वयं आते हैं और उनके सुख-दुख में सहभागी बनते हैं। मान्यता है कि जो भक्त रथयात्रा के दौरान भगवान के दर्शन करते हैं और रास्ते की धूल कीचड़ में लेट-लेट कर यात्रा पूरी करते हैं उन्हें श्री विष्णु के उत्तम धाम की प्राप्ति होती है |  इस उत्सव में तीनों मूर्तियों को अति भव्य और विशाल रथों में सुसज्जित होकर, यात्रा पर निकालते हैं | आषाढ़ माह में भगवान्, रथ पर सवार होकर अपनी मौसी रानी गुंडिचा के घर जाते हैं | यह रथ यात्रा 5  किलोमीटर में फैले पुरुषोत्तम क्षेत्र में ही होती है | रानी गुंडिचा भगवान् जगन्नाथ के परम भक्त राजा इन्द्रद्युम्न की पत्नी थी इसलिए रानी को भगवान् जगन्नाथ की मौसी कहा जाता है| अपनी मौसी के घर भगवान् 8 दिन तक रहते हैं | आषाढ़ शुक्ल दशमी को वापसी की यात्रा होती है | भगवान् जगन्नाथ का रथ नंदीघोष  है | देवी सुभद्रा का रथ दर्पदलन है और भाई बलभद्र का रथ तल  ध्वज है | पुरी  के गजपति  महाराज सोने की झाड़ू बुहारते हैं जिसे छेरा पैररन कहते हैं | 












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